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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
चिराभिलषितं काममद्य प्राप्स्यामि संय़ुगे |  ३   क
न हि मे मोक्ष्यसे जीवन्यदि नोत्सृजसे रणम् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति