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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
सम्प्रैक्षन्त जनास्तत्र युध्यमानौ युधां पती |  ३१   क
यूथपौ वाशिताहेतोः प्रय़ुद्धाविव कुञ्जरौ ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति