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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यस्य हय़ान्हत्वा धनुषी विनिकृत्य च |  ३२   क
विरथावसिय़ुद्धाय़ समेय़ातां महारणे ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति