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द्रोण पर्व
अध्याय १३४
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सञ्जय़ उवाच
तं प्रय़ान्तं महावाहुं दृष्ट्वा शारद्वतस्तदा |  ६१   क
अश्वत्थामानमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति