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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
सखड्गौ चित्रवर्माणौ सनिष्काङ्गदभूषणौ |  ३५   क
रणे रणोत्कटौ राजन्नन्योन्यं पर्यकर्षताम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति