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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
मुहूर्तमिव राजेन्द्र परिकृष्य परस्परम् |  ३६   क
पश्यतां सर्वसैन्यानां वीरावाश्वसतां पुनः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति