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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
रथस्थय़ोर्द्वय़ोर्युद्धे क्रुद्धय़ोर्योधमुख्ययोः |  ४६   क
केशवार्जुनय़ो राजन्समरे प्रेक्षमाणय़ोः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति