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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
यत्त्वं मामभिसन्धत्से त्वां चाहं शिनिपुङ्गव |  २४   क
त्वं हि प्राणैः प्रिय़तरो ममाहं च सदा तव ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति