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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
न वशं यज्ञशीलस्य गच्छेदेष वरारिहन् |  ४९   क
त्वत्कृते पुरुषव्याघ्र तदाशु क्रिय़तां विभो ||  ४९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति