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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
पश्य वृष्ण्यन्धकव्याघ्रं सौमदत्तिवशं गतम् |  ५५   क
तव शिष्यं महावाहो धनुष्यनवरं त्वय़ा ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति