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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
सैन्धवासक्तदृष्टित्वान्नैनं पश्यामि माधव |  ६१   क
एष त्वसुकरं कर्म यादवार्थे करोम्यहम् ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति