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द्रोण पर्व
अध्याय ११७
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सञ्जय़ उवाच
इत्युक्त्वा वचनं कुर्वन्वासुदेवस्य पाण्डवः |  ६२   क
सखड्गं यज्ञशीलस्य पत्रिणा वाहुमच्छिनत् ||  ६२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति