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अनुशासन पर्व
अध्याय १२८
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उमो उवाच
अय़ं मुनिगणः सर्वस्तपस्तप इति प्रभो |  २१   क
तपोन्वेषकरो लोके भ्रमते विविधाकृतिः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति