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शान्ति पर्व
अध्याय १९५
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मनुरु उवाच
श्रोत्रं खतो घ्राणमथो पृथिव्या; स्तेजोमय़ं रूपमथो विपाकः |  २०   क
जलाश्रय़ः स्वेद उक्तो रसश्च; वाय़्वात्मकः स्पर्शकृतो गुणश्च ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति