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शान्ति पर्व
अध्याय ११८
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भीष्म उवाच
अस्तव्धं प्रश्रितं शक्तं मृदुवादिनमेव च |  १४   क
धीरं श्लक्ष्णं महर्द्धिं च देशकालोपपादकम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति