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शान्ति पर्व
अध्याय ११८
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भीष्म उवाच
सचिवं यः प्रकुरुते न चैनमवमन्यते |  १५   क
तस्य विस्तीर्यते राज्यं ज्योत्स्ना ग्रहपतेरिव ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति