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शान्ति पर्व
अध्याय १७१
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भीष्म उवाच
अनन्तं वत मे वित्तं यस्य मे नास्ति किञ्चन |  ५६   क
मिथिलाय़ां प्रदीप्ताय़ां न मे दह्यति किञ्चन ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति