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अनुशासन पर्व
अध्याय ९४
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वृषादर्भिरु उवाच
प्रिय़ो हि मे व्राह्मणो याचमानो; दद्यामहं वोऽश्वतरीसहस्रम् |  १४   क
एकैकशः सवृषाः सम्प्रसूताः; सर्वेषां वै शीघ्रगाः श्वेतलोमाः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति