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शान्ति पर्व
अध्याय ११८
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भीष्म उवाच
अकुलीनस्तु पुरुषः प्रकृतः साधुसङ्क्षय़ात् |  ६   क
दुर्लभैश्वर्यतां प्राप्तो निन्दितः शत्रुतां व्रजेत् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति