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अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
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कीट उवाच
शकटस्यास्य महतो घोषं श्रुत्वा भय़ं मम |  १०   क
आगतं वै महावुद्धे स्वन एष हि दारुणः |  १०   ख
श्रूय़ते न स मां हन्यादिति तस्मादपाक्रमे ||  १०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति