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अनुशासन पर्व
अध्याय ११८
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कीट उवाच
सर्वत्र निरतो जीव इतीहापि सुखं मम |  १६   क
चेतय़ामि महाप्राज्ञ तस्मादिच्छामि जीवितुम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति