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शान्ति पर्व
अध्याय ३२३
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भीष्म उवाच
समाप्तय़ज्ञो राजापि प्रजाः पालितवान्वसुः |  ५५   क
व्रह्मशापाद्दिवो भ्रष्टः प्रविवेश महीं ततः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति