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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य मे तप्ततपसो निगृहीतेन्द्रिय़स्य च |  २२   क
नाराय़णप्रसादेन क्षीरोदस्यानुकूलतः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति