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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
गच्छन्स तीर्थानि महानुभावः; पुण्यानि रम्याणि ददर्श राजा |  १   क
सर्वाणि विप्रैरुपशोभितानि; क्वचित्क्वचिद्भारत सागरस्य ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति