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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
स तेन तीर्थेन तु सागरस्य; पुनः प्रय़ातः सह सोदरीय़ैः |  १५   क
द्विजैः पृथिव्यां प्रथितं महद्भि; स्तीर्थं प्रभासं समुपाजगाम ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति