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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
तमुग्रमास्थाय़ तपश्चरन्तं; शुश्राव रामश्च जनार्दनश्च |  १८   क
तौ सर्ववृष्णिप्रवरौ ससैन्यौ; युधिष्ठिरं जग्मतुराजमीढम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति