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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
ते वृष्णय़ः पाण्डुसुतान्समीक्ष्य; भूमौ शय़ानान्मलदिग्धगात्रान् |  १९   क
अनर्हतीं द्रौपदीं चापि दृष्ट्वा; सुदुःखिताश्चुक्रुशुरार्तनादम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति