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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
ते चापि सर्वान्प्रतिपूज्य पार्थां; स्तैः सत्कृताः पाण्डुसुतैस्तथैव |  २१   क
युधिष्ठिरं सम्परिवार्य राज; न्नुपाविशन्देवगणा यथेन्द्रम् ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति