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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वा तु ते तस्य वचः प्रतीता; स्तांश्चापि दृष्ट्वा सुकृशानतीव |  २३   क
नेत्रोद्भवं संमुमुचुर्दशार्हा; दुःखार्तिजं वारि महानुभावाः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति