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द्रोण पर्व
अध्याय १३७
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सञ्जय़ उवाच
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गौ कुरुवृष्णिय़शस्करौ |  १०   क
परस्परमवेक्षेतां दहन्ताविव लोचनैः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति