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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रार्जुनस्याग्र्यधनुर्धरस्य; निशम्य तत्कर्म परैरसह्यम् |  ५   क
सम्पूज्यमानः परमर्षिसङ्घैः; परां मुदं पाण्डुसुतः स लेभे ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति