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वन पर्व
अध्याय ११८
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्रोदधेः कञ्चिदतीत्य देशं; ख्यातं पृथिव्यां वनमाससाद |  ९   क
तप्तं सुरैर्यत्र तपः पुरस्ता; दिष्टं तथा पुण्यतमैर्नरेन्द्रैः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति