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उद्योग पर्व
अध्याय ११८
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नारद उवाच
चरन्ती हरिणैः सार्धं मृगीव वनचारिणी |  ११   क
चचार विपुलं धर्मं व्रह्मचर्येण संवृता ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति