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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
इदं तु यदतिक्षुद्रं वार्ष्णेय़ार्थे कृतं त्वय़ा |  १३   क
वासुदेवमतं नूनं नैतत्त्वय़्युपपद्यते ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति