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शान्ति पर्व
अध्याय १८०
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भरद्वाज उवाच
सर्वं पश्यति यद्दृश्यं मनोय़ुक्तेन चक्षुषा |  १६   क
मनसि व्याकुले तद्धि पश्यन्नपि न पश्यति ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति