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द्रोण पर्व
अध्याय १२३
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सञ्जय़ उवाच
तव वीर्यं वलं चैव रुद्रशक्रान्तकोपमम् |  २५   क
नेदृशं शक्नुय़ात्कश्चिद्रणे कर्तुं पराक्रमम् |  २५   ख
यादृशं कृतवानद्य त्वमेकः शत्रुतापनः ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति