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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
प्रहरिष्यन्हृतो वाहुरदृश्येन किरीटिना |  २   क
वेगेनाभ्यपतद्भूमौ पञ्चास्य इव पन्नगः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति