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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
निन्द्यमानौ तथा कृष्णौ नोचतुः किञ्चिदप्रिय़म् |  २०   क
प्रशस्यमानश्च तथा नाहृष्यद्यूपकेतनः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति