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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
आत्तशस्त्रस्य हि रणे वृष्णिवीरं जिघांसतः |  २५   क
यदहं वाहुमच्छैत्सं न स धर्मो विगर्हितः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति