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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
एवमुक्तस्तु पार्थेन शिरसा भूमिमस्पृशत् |  २७   क
पाणिना चैव सव्येन प्राहिणोदस्य दक्षिणम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति