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शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
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नागभार्यो उवाच
एतच्छ्रुत्वा महाप्राज्ञ तत्र गन्तुं त्वमर्हसि |  १६   क
दातुमर्हसि वा तस्य दर्शनं दर्शनश्रवः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति