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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
वार्यमाणः स कृष्णेन पार्थेन च महात्मना |  ३४   क
भीमेन चक्ररक्षाभ्यामश्वत्थाम्ना कृपेण च ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति