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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
प्राय़ोपविष्टाय़ रणे पार्थेन छिन्नवाहवे |  ३६   क
सात्यकिः कौरवेन्द्राय़ खड्गेनापाहरच्छिरः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति