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शान्ति पर्व
अध्याय २५४
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भीष्म उवाच
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा च वृत्तिः सुदारुणा |  ४४   क
भूमिं भूमिशय़ांश्चैव हन्ति काष्ठमय़ोमुखम् |  ४४   ख
तथैवानडुहो युक्तान्समवेक्षस्व जाजले ||  ४४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति