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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
नृशंसं वत कौन्तेय़ कर्मेदं कृतवानसि |  ४   क
अपश्यतो विषक्तस्य यन्मे वाहुमचिच्छिदः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति