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द्रोण पर्व
अध्याय ११८
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सञ्जय़ उवाच
स तेजसा शस्त्रहतेन पूतो; महाहवे देहवरं विसृज्य |  ५२   क
आक्रामदूर्ध्वं वरदो वरार्हो; व्यावृत्य धर्मेण परेण रोदसी ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति