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अनुशासन पर्व
अध्याय १०५
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गौतम उवाच
श्वेतं करेणुं मम पुत्रनागं; यं मेऽहार्षीर्दशवर्षाणि वालम् |  ५७   क
यो मे वने वसतोऽभूद्द्वितीय़; स्तमेव मे देहि सुरेन्द्र नागम् ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति