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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा कृष्णवाक्यप्रचोदितः |  १०५   क
भावित्वाच्च महाराज वक्तुं समुपचक्रमे ||  १०५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति