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आदि पर्व
अध्याय १८०
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वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीन्निर्मलतोय़दाभो; हलाय़ुधोऽनन्तरजं प्रतीतः |  २२   क
प्रीतोऽस्मि दिष्ट्या हि पितृष्वसा नः; पृथा विमुक्ता सह कौरवाग्र्यैः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति