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द्रोण पर्व
अध्याय ८७
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सञ्जय़ उवाच
आलभ्य वीरकांस्यं च हर्षेण महतान्वितः |  ६२   क
द्विगुणीकृततेजा हि प्रज्वलन्निव पावकः |  ६२   ख
उत्सङ्गे धनुरादाय़ सशरं रथिनां वरः ||  ६२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति