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शान्ति पर्व
अध्याय ११९
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भीष्म उवाच
कोष्ठागारं च ते नित्यं स्फीतं धान्यैः सुसञ्चितम् |  १७   क
सदास्तु सत्सु संन्यस्तं धनधान्यपरो भव ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति